ज्योतिषशास्त्र : मन्त्र आरती चालीसा

दन्त पीड़ा निवारण अथवा झाड़ने हेतु शाबर मन्त्र

संदीप पुलस्त्य

4 साल पूर्व

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शाबर मन्त्रों के आदि रचियता अथवा जनक भगवान् शिव ही हैं। प्राचीन ऋषि मुनि शाबर मन्त्रों के प्रयोग से आमजन के कष्ट निवारण किया करते थे। शिवजी द्वारा रचित शाबर मन्त्रों के पश्चात, उन मन्त्रों के आधार पर कुछ दूसरे शिवभक्त महर्षियों, सन्त-महात्माओं ने भी अलग अलग विचार व उद्द्श्योँ को लेकर अनेकों उसी प्रकार के ही मन्त्रों की रचना की। प्रभाव क्षमता में ये मन्त्र भगवान शिव द्वारा रचित मन्त्रों से कुछ ही कम प्रभाव देते हैं परन्तु हैं ये सब समान ही। शाबर मन्त्रों की विशिष्टता यह है कि इन मन्त्रों को कोई भी, कभी भी, कहीं भी जपकर सिद्ध कर सकता है। ये मन्त्र इतने सरल है व इनको सिद्ध करना भी इतना सरल है की कोई भी आमजन बड़ी आसानी से इन्हे सिद्ध कर लाभान्वित हो सकता है। शाबर मन्त्रों की जप साधना वैदिक मन्त्रों की अपेक्षा सरल है। अक्सर देखा जाता है कि छोटे बड़े साधु संत अथवा फकीर, इन मन्त्रों के प्रयोग से लोगों को चमत्कृत एवं उपकृत करते रहते हैं। शाबर मन्त्र प्रबल रूप से प्रभावी एवं अचूक है।

प्रायः हम देहातों में निरक्षर लोगों को भी चमत्कारिक झाड़ फूंक करते देखते हैं। वह सब इन्हीं शाबर मन्त्रों का प्रभाव ही है। दरिद्र, असभ्य कहे जाने वाले फकीर एवं दूसरी छोटी जातियों के लोग वस्तुतः किसी न किसी शाबर मन्त्र की सिद्धि प्राप्त हैं एवं उसका प्रयोग करके कभी कभी सभ्य, शिक्षित वर्ग को अचंभित कर देते हैं।

शाबर मन्त्र सहस्रों शताब्दियों से अनगिनत व्यक्तियों द्वारा अनुभूत किये गए हैं। इनकी साधना आमजन को वहीं सम्बल प्रदान करती है, जो एक देवता की साधना से प्राप्त किया जा सकता है। जीवन की किसी भी समस्या का, शाबर मन्त्र के जप से निश्चित एवं तीव्र समाधान किया जा सकता है।

यहां हम दन्त पीड़ा अथवा कष्ट निवारणार्थ शाबर मंत्र प्रस्तुत कर रहे है :

 

दन्त पीड़ा निवारक शाबर मन्त्र :-

 

मन्त्र - (1)    ओइम् नमो कीड़वे तू कुँडकुँडाजा, लाल पूंछ तेरा मुख काला।

                     मैं तोहिं पूछूँ कहां ते आया, तोड़ मांस सबको क्यों खाया।

                     अब तू जाय भस्म हो जाय, गुरु गोरखनाथ के लागूं पायं।

                     शब्द सांचाय पिण्ड काचा, फुरोमन्त्र ईश्वरोवाचा।

प्रयोग -   उक्त मन्त्र को पढ़ते हुए नीम की टहनी से रोगी को झड़ने पर दांत में लगे कीड़े मर जाते हैं एवं दन्त शूल का शमन हो जाता हैं।

           

 

मन्त्र - (2) (क)    अग्नि बांधों अग्नीश्वर बांधौं, सौ लाल विकराल बांधौ। data-matched-content-rows-num="2" data-matched-content-columns-num="2" data-matched-content-ui-type="image_stacked"

                             सौ लोह लोहार बांधौं, बज्र के निहाय,

                             बज्र घन दांत बिहाय तो महादेव की आन।

 

               (ख)    आग बांधौं, अगिया बैताल बांधौं,

                           सौ काल विकराल बांधौं, सौ लोहा लोहार बांधौं।

                           वज्र अस होय बज्रघन, दांत पिसय तो महादेव की आन।

प्रयोग -   उपर्युक्त दो में से किसी एक मन्त्र से, दायें हाथ की तर्जनी से रोगी को झाड़ना चाहिए। इस क्रिया से दांत का दर्द मिट जाता है।

 

 

मन्त्र - (3)    काहे रिसियाये हम तो अकेला, तुम हो बतीस बार म जोला।

                     हम लावैं, तुम बैठे खाव, अन्तकाल में संगहि जाव।

प्रयोग -   दांत दर्द से पीडि़त व्यक्ति जब भी मुंह धोये, या वैसे भी इस मन्त्र को पड़ते हुए कुल्ला करें तो दांत के दर्द से छुटकारा मिल जाता है।

 

 

मन्त्र- (4)     ओइम् नमो आदेश गुरु को,

                     बन में व्याई अंजनी, जिन जाया हनुमन्त।

                     कीड़ा-मकोड़ा ये तीनों भस्मत।

                     गुरु की शक्ति, मेरी भक्ति, फुरोमन्त्र ईश्वरोवाचा।

प्रयोग -   इस मन्त्र की साधना कुछ कठिन है, लेकिन इसका प्रभाव बड़ा अचूक है। दीपावली की रात्रि से इस मन्त्र का जप प्रारम्भ करना चाहिए। घर के किसी शुद्ध व एकांत स्थल पर शुद्ध गऊ के घी से दीपक जलाकर ऊतक मरे के एक लाख जप करें, ऐसा करने पर मन्त्र सिद्ध हो जाता है। सिद्ध हो जाने के पश्चात जब किसी को दन्त शूल की समस्या हो तो नीम की टहनी से इस सिद्ध मन्त्र पढ़ते हुए रोगी को झाड़ने से दन्त रोग का शमन होता है। इस मन्त्र को पढ़ते हुए रोगी के दांत में कष्टकारी भटकैया के बीजों की धूनी डालने से भी दन्त शूल का शमन हो जाता हे। इस धूनी के प्रभाव से दांत में लगा कीड़ा बाहर आ जाता है।

 

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