ज्योतिषशास्त्र : रत्न शास्त्र

लहसुनिया रत्न का सम्पूर्ण विवरण धारण विधि, शुद्धता परीक्षण एवं उपरत्न

संदीप कुमार सिंह

1 साल पूर्व

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समस्त नवग्रहों की श्रेणी में अन्तिम ग्रह केतु वास्तव राहु का शरीर है। इस गृह की गड़ना भी पापक ग्रहों में की जाती है। किन्तु, जातक की कुण्डली में शुभ स्थिति में होने पर यह सुखद परिणाम भी प्रदान करता है; परन्तु ऐसा संयोग कम लोगो को हे भोग्य होता है। लगभग समस्त व्यक्तिगण  राहु, केतु, शनि एवं मंगल से पीडि़त ही मिलते हैं। जब भी कोई व्यक्ति केतु ग्रह के कारणवर्ष  पीडि़त हो, उसको अनुकूल और प्रबल बनाने हेतु लहसुनिया रत्न धारण किया जा सकता है। वस्तुतः केतु का प्रतिनिधि रत्न लहसुनिया है। इसे संस्कृत भाषा में वैदूर्य, वायजा, विदुरज अथवा बिड़ालाक्ष से भी सम्बोधित करते हैं। अपनी रूपरेखा और चमक के कारणवर्ष  यह सही मायनो में बिल्ली की आँखों जैसा दिखाई देता है।

वैदूर्य के उपयोग का प्रचलन अन्य कई देशों में भी है और वहाँ की भाषा में इसका वर्णन भी प्राप्त है। बंगला भाषा में वैदूर्य रत्न को सूत्रमणि से सम्बोधित किया जाता है, गुजराती भाषा में लसणियों, बर्मी में चानों के नाम से ज्ञात है एवं अरबी भाषा में अनलहिर के नाम से सम्बोधित किया जाता है। अंग्रेजी में इसके लिए कोई मौलिक शब्द नहीं मिलता परन्तु इसकी संरचना के आधारानुसार इसको कैट आई कहा जाता है, जिसका तात्पर्य है बिल्ली की आँख।

लहसुनिया रत्न अर्थात वैदूर्य रत्न भारतवर्ष के मध्य भाग में सतपुड़ा पहाड़ के आसपास के क्षेत्रों में पाया जाता है। सर्वविदित है की संसार का सर्वश्रेष्ठ वैदूर्य रत्न श्रीलंका में उत्पन्न होता है। वैसे यह रत्न अमेरिका, ब्राजील और यूरोप प्रदेशों में भी उत्पन्न होता है। किन्तु अपनी चमक, गुणवत्ता एवं सुन्दर आभा के कारण श्रीलंका (सीलोन) का वैदूर्य रत्न  सर्वश्रेष्ठ श्रेणी का  माना जाता है।

वैदूर्य धानी रंग की चमक लिए पीली आभा युक्त पारदर्शी रत्न है। इसमें से काली, नीली, पीली या लाल झाईं जैसी निकलती रहती हैं। इस रत्न के अंदर प्राकृतिक रूप में सफेद धारियाँ पड़ी होती हैं, जिन्हें ब्रह्मसूत्र कहते हैं। इसमें अनूठापन यह है कि वैदूर्य को इधर उधर घुमाने पर ये धारियाँ भी चलती डोलती महसूस होती हैं। बिल्ली की आँख की तरह कँजे रंग का यह चमकदार स्टोन विभिन्न प्रकार की झलक दिखाता है।

लहसुनिया अथवा वैदूर्य रत्न को धारण करने के पूर्व इसकी निर्दोषता का किसी अनुभवी रत्न ज्योतिषाचार्य अथवा रत्नो के पारखी से परिक्षण करा लेना चाहिए। असली होने पर भी यदि वैदूर्य निर्दोष नहीं है, उसमें कोई कुलक्षण है, अशुभ चिन्ह है तो वह निश्चित रूप से अहितकारी होता है एवं इस कारण विपरीत व अशुभ फल प्रदान करता है।

लहसुनिया अथवा वैदूर्य रत्न धारण करने से पूर्व यह परीक्षण कर लेना उचित होता है कि कहीं वैदूर्य में ऐसे दोष तो नहीं हैं जिनके कारण यह रत्न अहितकारी परिणाम प्रदान करे। नीचे लिखे चिन्हों से युक्त लहसुनिया सदोष कहा जाता है -

उदारणार्थ वैदूर्य पर अपने रंग के अलावा अन्य किसी दूसरे रंग का धब्बा होना। यदि ऐसा दोष रत्न में उपस्थित है तो रत्न रोगकारी होता है। यदि रत्न में धारियाँ सीधी सुडौल न होकर टेढ़ी मेढ़ी काँपती जैसी दिखाई दे रही हों तो ऐसे दोषयुक्त रत्न का प्रभाव आँखों को पीड़ा प्रदान करता है। रत्न में यदि गुणक चिन्ह स्थित है तो ऐसा रत्न शस्त्राघात की शंका उत्पन्न करता है। यदि रत्न में आभाहीनता दिखाई दे तो ऐसा आभाहीन रत्न धनहानि करता है।

रत्न खण्डित, गडढ़ेदार एवं दरार युक्त है तो यह दोष शत्रु संख्या में वृद्धि करता है। रत्न कि चमक में यदि ज्वाला का आभास जो की अत्यधिक प्रचण्ड ज्योतियुक्त हो तो, ऐसा वैदूर्य रत्न वैवाहिक जीवन में आग लगाता है। पत्नीघात इसका प्रमुख दोष है।

किसी भी रंग के बिन्दु, छींटे, फुहार यदि इस रत्न पर स्थित हों तो यह चिन्ह भी बड़े घातक सिद्ध होते हैं। लाल बिन्दु का प्रभाव कारावास की स्थिति उत्पन्न करता है, श्वेत बिन्दु प्राण संकट में डालते हैं, और गहरे पीले बिन्दु राजभय की सूचना देते हैं।


लहसुनिया अथवा वैदूर्य रत्न पर ब्रह्मसूत्र अर्थात् धारियों की संख्या 4 से अधिक नहीं होनी चाहिए। पाँच या अधिक धारियों वाला वैदूर्य रत्न हानिकारक माना गया है।

अबरक की पर्तदार अथवा जालयुक्त लहसुनिया भी धारण योग्य नहीं होता है।

ज्योतिष शास्त्र के मत अनुसार वह जातक वैदूर्य रत्न धारण करके लाभान्वित हो सकता है, जिसकी कुण्डली में केतु ग्रह की स्थिति अनुकूल तो हो पर निर्बल हो। शुभ स्थिति वाले केतु को यदि वह निर्बल है तो सबल बनाकर उसका लाभ प्राप्त करने के लिए वैदूर्य रत्न धारण करना चाहिए।

अंग्रेजी ज्योतिषाचार्यों के विवेकानुसार वे समस्त लोग बिना किसी शंका के वैदूर्य रत्न धारण  कर सकते हैं, जिनका जन्म 15 मार्च से 14 अप्रैल के मध्य हुआ हो।

यह रत्न भूत प्रेत की बाघा से ग्रस्त लोगों के लिए भी हितकारी रहता है।

जन्मकुण्डली के भावों में बैठे ग्रहों की स्थिति देखकर ज्योतिषी यह मालूम कर लेते हैं कि केतु की स्थिति कैसी है, एवं कौन कौन से ग्रह कुण्डली में कारक अवस्था में है एवं कौनसे गृह विरोधी हैं। इस विश्लेषण के बाद वे प्रत्येक ग्रह के लिए रत्न की उपयोगिता बता देते हैं। सभी रत्न सभी ग्रहों के लिए नहीं पहने जा सकते। ग्रह विशेष का रत्न विशेष हो, वह भी तब जबकि ग्रह स्थिति अनुकूल हो, पहना जाता है।

 

लहसुनिया रत्न धारण विधि

लहसुनिया अथवा वैदूर्य को किसी ऐसे दिन धारण करना चाहिए, जब चन्द्रमा मीन, मेष या धनु राशि का हो, अथवा उस दिन अश्विनी, मघा या मूल नक्षत्र हो। इसे धारण करने का समय सूर्यास्त से लगभग एक पहर रात बीते तक उत्तम होता है। यह भी फौलाद, स्वर्ण अथवा  पंचधातु की अँगूठी में धारण किया जाता है।

आयुर्वेद विज्ञान में भी वैदूर्य रत्न का उल्लेख बड़ी प्रचुरता से मिलता है। अन्य रत्नों की भाँति इस खनिज रत्न की भी भस्म चूर्ण के प्रयोग से अनेकों प्रकार की जटिल शारीरिक व्याधियों का उपचार किया जाता है। जटिल और अतिकष्टप्रद रोगों के निवारणार्थ वैदूर्य भस्म में विशेष गुण उपलब्ध है। इसका सेवन उपदंश, मूत्रकृच्छ जैसे सिफलिस और गोनोरिया, नपुंसकता, अतिसार, नेत्ररोग, श्वास विकार, पाण्डु, कामला आदि रोगों से मुक्ति प्राप्त की जा सकती है।

प्रसूता के लिए भी यह रत्न धारणीय है। इसके प्रभाव से प्रसव पीड़ा काम होती। यही नहीं, इसको धारण करने से अजीर्ण एवं प्रदर रोग का निवारण भी किया जाता है।

 

लहसुनिया के उपरत्न

लहसुनिया रत्न के भी उपरत्न होते हैं जिन्हे लहसुनिया रत्न के आभाव में धारण किया जा सकता है लहसुनिया रत्न के कुछ उपरत्न अलक्षेन्द्र अथवा अलेक्जेण्डर, गोदन्ती, गोदन्ता, संघीय और कर्केतक हैं। कर्केतक और वैदूर्य में केवल यही अन्तर होता है कि वैदूर्य में सूत्र जैसी रेखायें होती हैं और कर्केतक में इनका अभाव होता है। शेष लक्षणों, रंग और आभा में दोनों समान होते हैं।

अलक्षेन्द्र एक दुर्लभ स्टोन है। इस रत्न की विशेषता यह होती है कि दिन के प्रकाश में यह रत्न  हरा तथा रात को दीपक के प्रकाश में लाल दिखायी पड़ता है।

बाज पक्षी तथा शेर की आँखों से मिलते जुलते दो रत्न और भी होते हैं जिन्हे श्येनाक्ष एवं व्याघ्राक्ष के नाम से जाना जाता है। ये भी वैदूर्य के उपरत्न हैं। इनमें भी धारियाँ होती हैं और चलायमान दिखाई प्रतीत होती हैं। दोनों में काफी समानता होती है। अन्तर केवल उनकी चमक से किया जा सकता है। श्येनाक्ष से नीली झाईं निकलती हैं और व्याघ्राक्ष से पीली आभा का प्रस्फुटन होता है। लेकिन इस अन्तर के बावजूद दोनों रत्न वैदूर्य रत्न के पूरक हैं व उसके स्थान पर धारण किये जाते हैं।

 

 

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